Friday, 5 June 2020

Gram Samaj yojna by central government

                    आदर्श ग्राम योजना

11 अक्टूबर 2014 को प्रारंभ की गई सांसद आदर्श ग्राम योजना (SAGY) का उद्देश्य गांवों और वहाँ के लोगों में उन मूल्यों को स्थापित करना है जिससे वे स्वयं के जीवन में सुधार कर दूसरों के लिए एक आदर्श गांव बने। जिससे लोग उनका अनुकरण उन बदलावों को स्वयं पर भी लागू करें। यह योजना संसद के दोनों सदनों के सांसदों को प्रोत्साहित करती है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम एक गांव की पहचान करें और 2016 तक एक आदर्श गांव उसका विकास करें। और 2019 दो और गांवों को शामिल करते हुए देश भर में फैले 6 लाख गांवों में से 2,500 से अधिक गांवों को इस योजना का हिस्सा बनाएं।

सांसद आदर्श ग्राम योजना की मान्यताएं

  • लोगों की भागीदारी को स्वीकार करना जैसा समस्याओं का अपने आप में समाधान है-सुनिश्चित करें कि समाज के सभी वर्ग ग्रामीण जीवन से संबंधित सभी पहलुओं से लेकर शासन से संबंधित सभी पहलुओं में भाग लें।
  • अंत्योदय का पालन करें- गांव के 'सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति "को अच्छी तरह जीवन जीने केल लिए सक्षम बनाएँ।
  • लैंगिक समानता और महिलाओं के लिए सम्मान सुनिश्चित करें।
  • सामाजिक न्याय की गारंटी को सुनिश्चित करें।
  • श्रम की गरिमा और सामुदायिक सेवा और स्वैच्छिकता की भावना को स्थापित करें।
  • सफाई की संस्कृति को बढ़ावा दें।
  • प्रकृति के सहचर के रुप में रहने के लिए-विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन सुनिश्चित करें।
  • स्थानीय सांस्कृतिक विरासत संरक्षण और प्रोत्साहन दें।
  • आपसी सहयोग, स्वयं सहायता और आत्म निर्भरता का निरंतर अभ्यास करना।
  • ग्रामीण समुदाय में शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना।
  • सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी बरतना।
  • स्थानीय स्वशासन की भावना को विकसित करना।
  • भारतीय संविधान में उल्लेखित मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों में प्रतिष्ठापित मूल्यों का पालन करना।

                       सहकारी विकास योजना

  • युवाओं की आवश्‍यकताओं एवं महत्त्वाकांक्षाओं को ध्‍यान में रखते हुए सहकारी व्‍यवसाय उपक्रमों की ओर ध्‍यान आकर्षि‍त करने के उद्देश्य से एनसीडीसी द्वारा यह योजना तैयार की गई है।
  • एनसीडीसी ने इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये उदार सुविधाओं के साथ एक विशेष निधि समर्पि‍त की है। नई योजना का शुभारंभ सहकारी समितियों को नए और अभिनव क्षेत्रों में नवाचार करने के लिये प्रोत्साहित करेगा।
  • यह योजना एनसीडीसी द्वारा सृजि‍त 1000 करोड़ रुपए के 'सहकारि‍ता स्‍टार्ट-अप एवं नवाचार नि‍धि‍' (सीएसआईएफ) से लिंक्‍ड होगी।
  • यह पूर्वोत्तर क्षेत्रों, महत्त्वाकांक्षी ज़ि‍लों तथा महि‍लाओं अथवा अनुसूचि‍त जाति‍ एवं अनुसूचि‍त जनजाति‍ व दि‍व्‍यांग सदस्‍यों की सहकारिता हेतु युवा अनुकूल पहलों में शामि‍ल होगी।
  • इन विशेष श्रेणियों के लिये वित्तपोषण परियोजना लागत का 80% तक होगा एवं अन्य के लिये यह 70% होगा।
  • जिन प्रोजेक्ट की लागत 3 करोड़ रुपए तक है उनके प्रोत्साहन के लिये योजना में ब्याज दर प्रचलित टर्म लोन पर लागू ब्याज दर से 2% कम होगी, साथ ही मूलधन के भुगतान पर 2 साल का अधिस्थगन दिया जाएगा।
  • योजना का लाभ लेने हेतु कम-से-कम एक वर्ष से संचालित सभी प्रकार की सहकारी समितियाँ पात्र होंगी।
  • एनसीडीसी सहकारि‍ता के क्षेत्र में अति‍महत्त्वपूर्ण वि‍त्तीय संस्‍था है जि‍सने वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय दोगुनी करने के लिये मि‍शन सहकार-22 की शुरूआत की है।

                        सूखा विकास कार्यक्रम 

  योजना आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. सी.एच. हनुमंत राव की अध्यक्षता में एक चौदह सदस्यीय तकनीकी समिति अप्रैल, 1993 में बनाई गई थी जिसने वर्तमान सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम और मरु विकास कार्यक्रम की विस्तार से जाँच की।
   इन कार्यक्रमों के लिये क्षेत्र के चुनाव के वर्तमान मापदंडों की समीक्षा और उसमें उपयुक्त संशोधन करना ताकि सूखे और मरुस्थलीकरण से वास्तव में प्रभावित क्षेत्रों को शामिल किया जा सके और जो वास्तव में प्रभावित नहीं हैं उन्हें कार्यक्रमों से हटाया जा सके।मरु विकास कार्यक्रम और सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम की केन्द्र, राज्य, जिला और जल-संभरण स्तर पर प्रशासनिक संरचना, कार्यक्रम की सामग्री, नियोजन कार्यविधि तथा वित्त पोषण के पैमाने और तरीके की समीक्षा करना और जहाँ भी आवश्यक हो उचित संशोधन करना। दोनों कार्यक्रमों को सम्बंधित क्षेत्र विकास कार्यक्रमों, जैसे वर्षा वाले क्षेत्रों में राष्ट्रीय जल-संभरण विकास परियोजना, राष्ट्रीय पर्ती भूमि कार्यक्रम आदि के साथ समेकित करने की सम्भावनाओं की जाँच करना और इसके लिये उपयुक्त कार्यनीति की सिफारिश करना।. शुष्क भूमि की तथा कृषि में खास तौर पर फसल उगाने के तरीके और कार्मिक रुकावटों के लिये उपयुक्त तकनीकों की पहचान करना और उपलब्ध तकनीकों को सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम और मरु विकास कार्यक्रम को हस्तांतरित करने के लिये अनुसंधान और प्रक्रिया की दिशाओं का सुझाव देना। जल संभरण समिति, पानी पंचायतों और गैर सरकारी संगठनों की भूमिका को बढ़ाने के उपाय सुझाना ताकि लोगों की भागीदारी को बढ़ाया जा सके और जन प्रतिनिधियों के खंडवार विभागों और धन के प्रति अधिक जिम्मेदारी को सुनिश्चित करना। इन दोनों कार्यक्रमों के संसाधनों को अन्य क्षेत्रों, विकास तथा लाभार्थी मूलक कार्यक्रमों के साथ न सिर्फ एकीकृत करने बल्कि वर्तमान कार्यक्रम-धन के प्रवाह के विकल्प के रूप में न मानकर पूरक और अतिरिक्त कोष के रूप में भी उपयोग को सुनिश्चित करने के उपायों की जाँच।

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